पर्यावरण और पारिस्थितिकी — जीवन का वह जाल जो हमें ज़िंदा रखता है
◆ 2–3 दिसंबर 1984 की रात भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कीटनाशक कारख़ाने से मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) नाम की ज़हरीली गैस रिस गई। हज़ारों लोग मारे गए और बहुत-से लोग जीवन भर के लिए बीमार हो गए। यह दुनिया की सबसे भयानक औद्योगिक दुर्घटनाओं में से एक थी। दो साल बाद संसद ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया — एक "छाता" (umbrella) क़ानून, जो हवा, पानी और ज़मीन — तीनों की एक साथ रक्षा करता है। उस एक रात ने भारत को कठोर सबक दिया: जब हम पर्यावरण को चोट पहुँचाते हैं, तो पर्यावरण पलटकर हमें चोट पहुँचाता है। इस अध्याय में आप सीखेंगे कि प्रकृति आपस में कैसे जुड़ी है, प्रदूषण इन कड़ियों को कैसे तोड़ता है, और कौन-से क़ानून और अंतरराष्ट्रीय समझौते इन्हें जोड़ने की कोशिश करते हैं।
आज आप क्या सीखेंगे (सीखने के उद्देश्य)
पारितंत्र (ecosystem) क्या है — उत्पादक, उपभोक्ता, अपघटक, खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल
ऊर्जा का 10% नियम और तीन पारिस्थितिक पिरामिड
जैव विविधता, हॉटस्पॉट, तथा स्वस्थाने (in-situ) और बाह्य-स्थाने (ex-situ) संरक्षण
वायु, जल और मृदा प्रदूषण — प्रदूषक, उससे होने वाला रोग और परीक्षक का जाल
ओज़ोन क्षरण और हरितगृह प्रभाव — दो अलग-अलग समस्याएँ
भारत के पर्यावरण क़ानून और अंतरराष्ट्रीय समझौते, उनके वर्षों के साथ
इस अध्याय पर परीक्षक के प्रिय जाल, और उन्हें हराने के आसान सूत्र
भाग A — पारिस्थितिकी की बुनियाद
1. पर्यावरण, पारिस्थितिकी और पारितंत्र
पर्यावरण यानी किसी जीव के चारों ओर की हर चीज़ — हवा, पानी, मिट्टी, प्रकाश और दूसरे जीव।
पारिस्थितिकी (Ecology) वह विज्ञान है जो बताता है कि जीव आपस में और अपने परिवेश के साथ कैसे पारस्परिक क्रिया करते हैं। यह शब्द जर्मन जीवविज्ञानी अर्न्स्ट हेकेल (Ernst Haeckel) ने दिया।
पारितंत्र या पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem): किसी क्षेत्र के सभी जीव और उनके आसपास के निर्जीव घटक मिलकर एक इकाई की तरह काम करते हैं। यह शब्द ए. जी. टैन्सले (A. G. Tansley) ने 1935 में दिया। तालाब, वन, घास का मैदान, यहाँ तक कि एक बगीचा भी पारितंत्र है। मनुष्य द्वारा बनाया गया खेत या जलजीवशाला (aquarium) कृत्रिम पारितंत्र है।
हर पारितंत्र के दो प्रकार के घटक होते हैं:
जैविक (Biotic) घटक — पौधे, जंतु, सूक्ष्मजीव।
अजैविक (Abiotic) घटक — सूर्य का प्रकाश, ताप, वर्षा, मिट्टी, जल, खनिज।
🧠 Active Recall: "पारिस्थितिकी" शब्द किसने दिया और "पारितंत्र" शब्द किसने? (हेकेल — पारिस्थितिकी; टैन्सले — पारितंत्र।)
2. कौन किसे खाता है — उत्पादक, उपभोक्ता, अपघटक
उत्पादक (Producers) — हरे पौधे और शैवाल। ये सूर्य के प्रकाश से प्रकाश-संश्लेषण करके भोजन बनाते हैं। इन्हें स्वपोषी (autotrophs) भी कहते हैं।
उपभोक्ता (Consumers) — वे जंतु जो भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर हैं (परपोषी)।
प्राथमिक उपभोक्ता = शाकाहारी (हिरण, गाय, टिड्डा)।
द्वितीयक उपभोक्ता = शाकाहारियों को खाने वाले मांसाहारी (मेंढक, लोमड़ी)।
तृतीयक उपभोक्ता = दूसरे मांसाहारियों को खाने वाले मांसाहारी (साँप, गरुड़/चील)।
अपघटक (Decomposers) — जीवाणु (bacteria) और कवक (fungi)। ये मृत पौधों और जंतुओं को सरल पदार्थों में तोड़कर पोषक तत्व मिट्टी में लौटा देते हैं। इनके बिना धरती मृत शरीरों से ढक जाती और मिट्टी के खनिज ख़त्म हो जाते।
खाद्य श्रृंखला (Food chain): "कौन किसे खाता है" की एक सीधी कतार।
उदाहरण: घास → टिड्डा → मेंढक → साँप → गरुड़।
खाद्य श्रृंखला की हर कड़ी को पोषी स्तर (trophic level) कहते हैं। उत्पादक पहला पोषी स्तर हैं; शाकाहारी दूसरा।
खाद्य जाल (Food web): कई खाद्य श्रृंखलाएँ आपस में जुड़कर जाल बनाती हैं। असली पारितंत्रों में खाद्य जाल होते हैं, क्योंकि ज़्यादातर जंतु एक से अधिक प्रकार का भोजन खाते हैं।
चराई खाद्य श्रृंखला (grazing) हरे पौधों से शुरू होती है; अपरद खाद्य श्रृंखला (detritus) मृत कार्बनिक पदार्थ से शुरू होती है।
🧠 Active Recall: जब आप दाल-चावल खाते हैं, तो आप किस पोषी स्तर पर हैं? (दूसरे — आप प्राथमिक उपभोक्ता हैं।)
3. 10% नियम और ऊर्जा प्रवाह
लगभग हर पारितंत्र की ऊर्जा का स्रोत सूर्य है। हरे पौधे अपने ऊपर पड़ने वाले सूर्य-प्रकाश का बहुत छोटा हिस्सा ही पकड़ पाते हैं।
जब एक जीव दूसरे को खाता है, तो ऊर्जा का केवल लगभग 10% भाग ही अगले पोषी स्तर तक पहुँचता है। बाकी जीव की अपनी जैविक क्रियाओं में ख़र्च होता है और ज़्यादातर ऊष्मा के रूप में निकल जाता है। इसे 10% नियम कहते हैं (रेमंड लिंडमैन, 1942)।
उदाहरण: यदि पौधों में 10,000 J ऊर्जा है, तो शाकाहारियों को लगभग 1,000 J, उन्हें खाने वाले मांसाहारियों को लगभग 100 J और शीर्ष मांसाहारियों को केवल लगभग 10 J मिलेगी। इसीलिए खाद्य श्रृंखला में आमतौर पर 3–4 या 5 कड़ियाँ ही होती हैं।
ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय (unidirectional) है — सूर्य से उत्पादक, उत्पादक से उपभोक्ता; वह कभी वापस नहीं लौटती। पोषक तत्व (कार्बन, नाइट्रोजन, फ़ॉस्फ़ोरस) चक्रीय हैं — अपघटक उन्हें मिट्टी में लौटाते हैं ताकि वे दोबारा इस्तेमाल हों।
सूत्र: "ऊर्जा का एकतरफ़ा टिकट, पोषक तत्वों का वापसी टिकट।"
4. पारिस्थितिक पिरामिड
पिरामिड में हर पोषी स्तर एक सीढ़ी की तरह दिखाया जाता है, सबसे नीचे उत्पादक।
संख्या का पिरामिड — जीवों की गिनती। घास के मैदान में सीधा (घास के पौधे बहुत, टिड्डे कम, मेंढक और कम)। एक बड़े पेड़ और उस पर रहने वाले बहुत-से कीटों के लिए उल्टा।
जैवभार का पिरामिड (biomass) — जीवित पदार्थ का भार। स्थल पर सीधा। समुद्र में उल्टा, क्योंकि आधार पर मौजूद सूक्ष्म पादप-प्लवक (phytoplankton) का भार किसी एक समय पर उन्हें खाने वाली मछलियों से कम होता है।
ऊर्जा का पिरामिड — हमेशा सीधा। यह कभी उल्टा नहीं हो सकता, क्योंकि हर स्तर पर ऊर्जा घटती है।
🧠 Active Recall: कौन-सा पिरामिड कभी उल्टा नहीं हो सकता? (ऊर्जा का पिरामिड।)
5. जैव-भू-रासायनिक चक्र संक्षेप में
वायु में लगभग 78% नाइट्रोजन और लगभग 21% ऑक्सीजन है। पर पौधे नाइट्रोजन गैस को सीधे इस्तेमाल नहीं कर सकते।
नाइट्रोजन स्थिरीकरण: फलीदार (leguminous) पौधों (मटर, चना, सेम) की जड़-ग्रंथिकाओं में रहने वाले राइज़ोबियम (Rhizobium) जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ऐसे यौगिकों में बदलते हैं जिन्हें पौधे इस्तेमाल कर सकें। बिजली कड़कने (तड़ित) से भी कुछ नाइट्रोजन स्थिर होती है। विनाइट्रीकारी (denitrifying) जीवाणु नाइट्रोजन को वापस वायु में भेजते हैं।
कार्बन चक्र: पौधे प्रकाश-संश्लेषण में कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं; श्वसन, सड़न और ईंधन जलने से यह वापस वायु में जाती है।
पारिस्थितिक अनुक्रमण (Ecological succession): किसी क्षेत्र में समय के साथ समुदायों का धीरे-धीरे बदलना। नंगी चट्टान पर लाइकेन (lichens) पहली प्रजाति (pioneer species) होते हैं; अंतिम स्थिर समुदाय को चरम समुदाय (climax community) कहते हैं।
भाग B — जैव विविधता और संरक्षण
6. जैव विविधता
जैव विविधता यानी जीवन की विविधता — जीन, प्रजाति और पारितंत्र के स्तर पर। NCERT के अनुसार भारत के पास विश्व के स्थल क्षेत्र का केवल लगभग 2.4% है, पर विश्व की दर्ज प्रजाति-विविधता का लगभग 8.1% भारत में है। भारत 17 महाविविधता (megadiverse) वाले देशों में से एक है।
जैव विविधता हॉटस्पॉट वे क्षेत्र हैं जहाँ प्रजातियाँ बहुत अधिक हैं, स्थानिक (endemic — कहीं और न मिलने वाली) प्रजातियाँ बहुत हैं, और जो गंभीर ख़तरे में हैं। यह विचार नॉर्मन मायर्स (Norman Myers) ने दिया। भारत के हिस्सों को ढकने वाले हॉटस्पॉट: हिमालय, इंडो-बर्मा, पश्चिमी घाट और श्रीलंका, तथा सुंडालैंड (जिसमें निकोबार द्वीप समूह आते हैं)।
जैव विविधता क्यों घटती है — "दुष्ट चौकड़ी" (Evil Quartet, NCERT कक्षा 12):
- आवास का नष्ट होना और टुकड़ों में बँटना (सबसे बड़ा कारण)
- अति-दोहन (जैसे स्टेलर समुद्री गाय और पैसेंजर कबूतर का शिकार करके विलोप)
- विदेशी (alien) प्रजातियों का आक्रमण (जैसे विक्टोरिया झील में नील पर्च मछली; भारत में गाजर घास (पार्थेनियम), लैंटाना और जलकुंभी जैसी खरपतवार)
- सह-विलुप्ति (co-extinction — जब कोई पोषी जीव विलुप्त होता है तो उस पर निर्भर विशेष परजीवी भी विलुप्त हो जाते हैं)
परीक्षा में पूछे जाने वाले विलुप्त जीव: डोडो (मॉरीशस), क्वागा (अफ़्रीका), थाइलेसिन (ऑस्ट्रेलिया), स्टेलर समुद्री गाय (रूस)। भारत में चीता 1952 में विलुप्त घोषित किया गया।
🧠 Active Recall: "दुष्ट चौकड़ी" के चार कारण बताइए। (आवास-हानि, अति-दोहन, विदेशी प्रजातियाँ, सह-विलुप्ति।)
7. संरक्षण: स्वस्थाने और बाह्य-स्थाने
स्वस्थाने संरक्षण (In-situ) = प्रजातियों को उनके प्राकृतिक घर में ही बचाना। उदाहरण: राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (biosphere reserve), पवित्र उपवन (sacred groves)।
बाह्य-स्थाने संरक्षण (Ex-situ) = प्रजातियों को उनके प्राकृतिक घर से बाहर बचाना। उदाहरण: चिड़ियाघर, वनस्पति उद्यान, बीज बैंक, जीन बैंक, क्रायोप्रिज़र्वेशन (अति-शीत संरक्षण)।
सूत्र: "IN-situ = जंगल के अंदर (IN); EX-situ = जंगल से बाहर (EXit)।"
जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र के तीन क्षेत्र होते हैं: कोर (core) क्षेत्र (पूर्ण संरक्षित, कोई मानव गतिविधि नहीं), बफ़र (buffer) क्षेत्र (शोध, शिक्षा जैसी सीमित गतिविधियाँ) और संक्रमण (transition) क्षेत्र (जहाँ लोग रहते और काम करते हैं)। नीलगिरि जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (1986) भारत का पहला जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र है। ये यूनेस्को के "मानव और जैवमंडल" (MAB) कार्यक्रम से जुड़े हैं।
पवित्र उपवन — जंगल के वे टुकड़े जिन्हें समुदाय धार्मिक कारणों से बचाते हैं, जैसे मेघालय की खासी और जयंतिया पहाड़ियाँ, राजस्थान की अरावली पहाड़ियाँ और पश्चिमी घाट।
8. संरक्षित क्षेत्र और प्रजाति परियोजनाएँ
भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान: हेली राष्ट्रीय उद्यान (1936), जिसे अब जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान (उत्तराखंड) कहते हैं।
प्रसिद्ध उद्यान और उनके जीव:
गिर (गुजरात) — एशियाई शेर
काज़ीरंगा (असम) — एक सींग वाला गैंडा
सुंदरबन (पश्चिम बंगाल) — मैंग्रोव वन में रॉयल बंगाल टाइगर (नाम सुंदरी पेड़ से)
दाचीगाम (जम्मू-कश्मीर) — हंगुल (कश्मीरी बारहसिंगा)
केइबुल लामजाओ (मणिपुर) — संगाई हिरण; लोकटक झील पर एकमात्र तैरता राष्ट्रीय उद्यान
केवलादेव (भरतपुर, राजस्थान) — पक्षी; कभी साइबेरियन सारस के लिए प्रसिद्ध
साइलेंट वैली (केरल) — शेर-पूँछ वाला बंदर (lion-tailed macaque)
एराविकुलम (केरल) — नीलगिरि तहर
मरु राष्ट्रीय उद्यान (राजस्थान) — गोडावण (Great Indian Bustard, अति संकटग्रस्त)
गहिरमाथा तट (ओडिशा) — ओलिव रिडले कछुओं का सामूहिक घोंसला-निर्माण
प्रजाति परियोजनाएँ:
प्रोजेक्ट टाइगर — 1973 में शुरू। बाघ 1973 में राष्ट्रीय पशु बना। बाघ अभयारण्य (tiger reserve) अब वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (2006 में संशोधित) के तहत अधिसूचित होते हैं; इसी संशोधन से राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) बना।
प्रोजेक्ट एलीफ़ेंट — 1992 में शुरू। हाथी 2010 में राष्ट्रीय धरोहर पशु घोषित हुआ।
गंगा नदी डॉल्फ़िन — राष्ट्रीय जलीय जीव (2009)।
🧠 Active Recall: कौन-सा राष्ट्रीय उद्यान तैरता है? (केइबुल लामजाओ, लोकटक झील, मणिपुर।)
9. वे लोग जिन्होंने जंगल बचाए
बिश्नोई समुदाय (राजस्थान): 1730 में खेजड़ली (जोधपुर के पास) में अमृता देवी बिश्नोई और अनेक ग्रामीणों ने खेजड़ी के पेड़ बचाने के लिए प्राण दे दिए।
चिपको आंदोलन (1973): चमोली ज़िले (अब उत्तराखंड) से शुरू। ग्रामीण पेड़ों से चिपक गए ताकि वे काटे न जाएँ। नेता: सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट; रेणी गाँव की महिलाओं का नेतृत्व गौरा देवी ने किया।
अप्पिको आंदोलन (1983): कर्नाटक — "दक्षिण का चिपको", नेता पांडुरंग हेगड़े।
साइलेंट वैली आंदोलन (केरल): एक जलविद्युत परियोजना रुकवाई; साइलेंट वैली 1984 में राष्ट्रीय उद्यान बनी।
नर्मदा बचाओ आंदोलन: मेधा पाटकर के नेतृत्व में, नर्मदा पर बड़े बाँधों के विरुद्ध।
संयुक्त वन प्रबंधन (JFM): स्थानीय समुदायों को बिगड़े वनों के प्रबंधन और पुनर्स्थापन में शामिल करना; पहला प्रस्ताव 1988 में ओडिशा ने पारित किया।
भाग C — प्रदूषण
10. वायु प्रदूषण
प्रदूषक = कोई भी पदार्थ जो ग़लत जगह या ग़लत मात्रा में होने पर जीवों को नुकसान पहुँचाए।
प्राथमिक प्रदूषक सीधे छोड़े जाते हैं (सल्फ़र डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, धुआँ)।
द्वितीयक प्रदूषक वायु में प्राथमिक प्रदूषकों से बनते हैं (धरातलीय ओज़ोन, प्रकाश-रासायनिक धूम-कोहरे में PAN, अम्लीय वर्षा)।
कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) — अधूरे दहन से; यह ऑक्सीजन की तुलना में हीमोग्लोबिन से कहीं अधिक मज़बूती से जुड़ती है और रक्त की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता घटा देती है।
सल्फ़र डाइऑक्साइड (SO2) और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) — अम्लीय वर्षा का कारण। अम्लीय वर्षा संगमरमर को गलाती है; NCERT के अनुसार आगरा और मथुरा के आसपास के उद्योगों के प्रदूषकों से ताजमहल का संगमरमर क्षतिग्रस्त हो रहा है ("संगमरमर कैंसर")।
धूम-कोहरा (Smog) = धुआँ (smoke) + कोहरा (fog)।
लाइकेन वायु प्रदूषण के अच्छे सूचक हैं — अधिक सल्फ़र डाइऑक्साइड वाले क्षेत्रों में ये नहीं उगते।
PM2.5 = 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम व्यास वाले महीन कण; ये फेफड़ों में गहराई तक जाते हैं।
वाहनों में कैटेलिटिक कन्वर्टर ज़हरीली निकास गैसों को घटाता है। CNG पेट्रोल और डीज़ल से स्वच्छ ईंधन है।
11. जल और मृदा प्रदूषण
सुपोषण (Eutrophication): जब उर्वरक (नाइट्रेट और फ़ॉस्फ़ेट) और सीवेज झील में पहुँचते हैं, तो शैवाल तेज़ी से बढ़ते हैं (शैवाल प्रस्फुटन — algal bloom)। शैवाल मरते हैं तो अपघटक घुली ऑक्सीजन ख़र्च कर देते हैं और मछलियाँ मर जाती हैं।
BOD (जैव-रासायनिक ऑक्सीजन माँग): पानी में कार्बनिक पदार्थ को तोड़ने के लिए सूक्ष्मजीवों को चाहिए ऑक्सीजन। अधिक BOD = अधिक कार्बनिक प्रदूषण। स्वच्छ पानी का BOD कम होता है।
जैव आवर्धन (Biological magnification): DDT और पारा जैसे हानिकारक, अजैव-निम्नीकरणीय रसायन खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करते हैं और हर ऊँचे पोषी स्तर पर इनकी सांद्रता बढ़ती जाती है। शीर्ष मांसाहारी (और मनुष्य) को सबसे अधिक मात्रा मिलती है।
प्रदूषक–रोग जोड़े (बहुत महत्वपूर्ण):
पारा (Mercury) → मिनामाटा रोग (जापान)
कैडमियम → इटाई-इटाई रोग (जापान)
पीने के पानी में नाइट्रेट → ब्लू बेबी सिंड्रोम
अधिक फ़्लोराइड → फ़्लोरोसिस (दाँत और हड्डियाँ)
आर्सेनिक → ब्लैकफ़ुट रोग और त्वचा रोग
सीसा (Lead) → तंत्रिकाओं और मस्तिष्क को नुकसान, विशेषकर बच्चों में
शोर को डेसिबल (dB) में मापा जाता है।
जैव-निम्नीकरणीय (biodegradable) पदार्थ सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटित हो जाते हैं (सब्ज़ियों के छिलके, कागज़, सूती कपड़ा)। अजैव-निम्नीकरणीय पदार्थ नहीं होते (प्लास्टिक, काँच, DDT, एल्युमिनियम के डिब्बे)। मदद करने वाली आदतें: कम उपयोग (Reduce), पुनः उपयोग (Reuse), पुनर्चक्रण (Recycle)।
🧠 Active Recall: पारा और कैडमियम — दोनों से जापान में रोग फैले। कौन-सा किससे? (पारा — मिनामाटा; कैडमियम — इटाई-इटाई।)
भाग D — ओज़ोन और जलवायु
12. ओज़ोन परत
समताप मंडल (stratosphere) में ओज़ोन (O3) मिलकर ओज़ोन परत बनाती है, जो सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को सोख लेती है। UV किरणों से त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद और पौधों को नुकसान हो सकता है।
धरती के पास (क्षोभ मंडल में) ओज़ोन एक हानिकारक प्रदूषक है — "ऊपर रक्षक, नीचे भक्षक"।
रेफ़्रिजरेटर, एयर-कंडीशनर और स्प्रे में इस्तेमाल होने वाले क्लोरोफ़्लोरोकार्बन (CFCs) समताप मंडल तक पहुँचते हैं, जहाँ UV प्रकाश उन्हें तोड़कर क्लोरीन परमाणु मुक्त करता है। क्लोरीन ओज़ोन को नष्ट करता है। सबसे अधिक पतलापन अंटार्कटिका के ऊपर है — "ओज़ोन छिद्र"।
ओज़ोन की मोटाई डॉबसन इकाई (Dobson Unit, DU) में मापी जाती है।
समझौते: वियना अभिसमय (1985) — ढाँचा; मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (16 सितंबर 1987 को हस्ताक्षरित) — ओज़ोन-क्षयकारी पदार्थों को चरणबद्ध रूप से समाप्त करना; किगाली संशोधन (2016) — HFCs को चरणबद्ध रूप से घटाना जोड़ा। विश्व ओज़ोन दिवस: 16 सितंबर।
13. हरितगृह प्रभाव और वैश्विक तापन
वायु की कुछ गैसें पृथ्वी से निकलने वाली ऊष्मा को रोक लेती हैं, जैसे ग्रीनहाउस (हरितगृह) का काँच। बिना किसी हरितगृह प्रभाव के पृथ्वी जीवन के लिए बहुत ठंडी होती।
मुख्य हरितगृह गैसें: कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मीथेन (CH4), नाइट्रस ऑक्साइड (N2O), CFCs और जलवाष्प। नाइट्रोजन (N2) और ऑक्सीजन (O2) हरितगृह गैसें नहीं हैं।
वैश्विक तापन में सबसे अधिक योगदान कार्बन डाइऑक्साइड का है। मीथेन धान के खेतों, मवेशियों, दलदली भूमि और कूड़े के ढेरों से निकलती है।
वैश्विक तापन के प्रभाव: हिमनदों का पिघलना, समुद्र-तल का बढ़ना, प्रवाल विरंजन (coral bleaching — पानी अधिक गर्म होने पर प्रवाल अपने रंगीन शैवाल खो देते हैं), वर्षा के ढंग में बदलाव और अधिक चरम मौसम।
सूत्र: "ओज़ोन छिद्र = छाता फटा (UV अंदर)। हरितगृह = कंबल बहुत मोटा (गर्मी अंदर)।"
🧠 Active Recall: क्या ओज़ोन क्षरण और वैश्विक तापन एक ही चीज़ हैं? (नहीं — एक UV को अंदर आने देता है, दूसरा ऊष्मा को रोकता है। CFCs दोनों में भूमिका निभाते हैं।)
भाग E — क़ानून और समझौते
14. संविधान में पर्यावरण
42वें संशोधन (1976) ने जोड़ा:
अनुच्छेद 48A — नीति-निदेशक तत्व: राज्य पर्यावरण की रक्षा और सुधार तथा वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा का प्रयास करेगा।
अनुच्छेद 51A(g) — मूल कर्तव्य: हर नागरिक वन, झील, नदी और वन्यजीव सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करेगा।
इसी संशोधन ने "वन" और "वन्य पशुओं और पक्षियों का संरक्षण" को राज्य सूची से समवर्ती सूची में डाला।
15. भारत के पर्यावरण क़ानून (वर्ष सहित)
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम — 1972
जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम — 1974 (इसी के तहत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बना)
वन (संरक्षण) अधिनियम — 1980 (2023 के संशोधन से नाम बदलकर वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 — Van (Sanrakshan Evam Samvardhan) Adhiniyam)
वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम — 1981
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम — 1986 (भोपाल गैस त्रासदी के बाद; एक छाता क़ानून)
जैव विविधता अधिनियम — 2002 (राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, चेन्नई)
वन अधिकार अधिनियम — 2006 (जनजातीय और वनवासी समुदायों के अधिकार)
राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम — 2010 (NGT अक्टूबर 2010 में बना; प्रधान पीठ नई दिल्ली)
पर्यावरण और वन मंत्रालय 1985 में बना; 2014 में इसके नाम में "जलवायु परिवर्तन" जुड़ा (MoEFCC)। भारतीय वन सर्वेक्षण (देहरादून) हर दो वर्ष में "भारत वन स्थिति रिपोर्ट" प्रकाशित करता है। राष्ट्रीय वन नीति, 1988 का लक्ष्य है देश के एक-तिहाई (33%) क्षेत्र को वन या वृक्ष आवरण में लाना।
अधिनियमों के क्रम का सूत्र: "वन्य जल वन वायु पर्यावरण" — 72, 74, 80, 81, 86। इसे ऐसे पढ़ें: "वन्य पशु जल पीते हैं, वन में रहते हैं, वायु में साँस लेते हैं — यही पर्यावरण है।"
16. अंतरराष्ट्रीय समझौते (वर्ष सहित)
रामसर अभिसमय (1971) — आर्द्रभूमि (wetlands); ईरान के रामसर शहर में हस्ताक्षरित। विश्व आर्द्रभूमि दिवस: 2 फ़रवरी। भारत 1982 में जुड़ा; चिल्का झील (ओडिशा) और केवलादेव (राजस्थान) भारत के पहले रामसर स्थल (1981) थे। मॉन्ट्रो रिकॉर्ड (Montreux Record) उन रामसर स्थलों की सूची है जिनकी पारिस्थितिकी बिगड़ी है या बिगड़ने की आशंका है।
स्टॉकहोम सम्मेलन (1972) — मानव पर्यावरण पर पहला संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन; इससे UNEP बना (मुख्यालय नैरोबी, केन्या)। विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) इसके उद्घाटन दिवस की याद में है।
CITES (1973) — संकटग्रस्त वन्य जंतुओं और पौधों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर नियंत्रण; वॉशिंगटन डी.सी. में हस्ताक्षरित; भारत 1976 में पक्षकार बना। विश्व वन्यजीव दिवस (3 मार्च) इसके हस्ताक्षर दिवस की याद में है।
वियना अभिसमय (1985) और मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) — ओज़ोन परत।
बेसल अभिसमय (1989) — ख़तरनाक कचरे का सीमा-पार परिवहन।
रियो पृथ्वी सम्मेलन (1992) — UNFCCC (जलवायु), जैव विविधता अभिसमय (CBD), एजेंडा 21।
क्योटो प्रोटोकॉल (1997) — विकसित देशों के लिए हरितगृह गैसें घटाने के क़ानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्य; 2005 में लागू।
पेरिस समझौता (2015, COP21) — वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2°C से काफ़ी नीचे रखना और 1.5°C तक सीमित करने का प्रयास; 2016 में लागू।
अन्य नाम: IUCN (ग्लैंड, स्विट्ज़रलैंड) संकटग्रस्त प्रजातियों की लाल सूची (Red List / Red Data Book) प्रकाशित करता है। IPCC 1988 में WMO और UNEP ने बनाया। ब्रंटलैंड रिपोर्ट "हमारा साझा भविष्य" (Our Common Future, 1987) ने सतत विकास (sustainable development) की परिभाषा दी: आज की ज़रूरतें इस तरह पूरी करना कि आने वाली पीढ़ियों की ज़रूरतें पूरी करने की क्षमता को नुकसान न पहुँचे।
समझौतों के क्रम का सूत्र: "राम चला वन, मिला राजा, किया प्रणाम" — रामसर 1971, CITES 1973, वियना 1985, मॉन्ट्रियल 1987, रियो 1992, क्योटो 1997, पेरिस 2015।
हरित दिवस कैलेंडर:
2 फ़रवरी — विश्व आर्द्रभूमि दिवस | 3 मार्च — विश्व वन्यजीव दिवस | 21 मार्च — अंतरराष्ट्रीय वन दिवस | 22 मार्च — विश्व जल दिवस | 22 अप्रैल — पृथ्वी दिवस | 22 मई — अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस | 5 जून — विश्व पर्यावरण दिवस | 16 सितंबर — विश्व ओज़ोन दिवस | 2 दिसंबर — राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस (भारत, भोपाल की याद में)
सारांश तालिका
| विषय | ज़रूर याद रखें |
|---|---|
| पारितंत्र (शब्द) | ए. जी. टैन्सले, 1935 |
| पारिस्थितिकी (शब्द) | अर्न्स्ट हेकेल |
| 10% नियम | रेमंड लिंडमैन, 1942 |
| हमेशा सीधा पिरामिड | ऊर्जा का पिरामिड |
| उल्टा जैवभार पिरामिड | समुद्र / तालाब |
| अपघटक | जीवाणु और कवक |
| पहला राष्ट्रीय उद्यान | हेली (1936), अब जिम कॉर्बेट |
| पहला जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र | नीलगिरि (1986) |
| प्रोजेक्ट टाइगर / एलीफ़ेंट | 1973 / 1992 |
| पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम | 1986, भोपाल (1984) के बाद |
| ओज़ोन परत | समताप मंडल; CFCs से क्षरण; मॉन्ट्रियल 1987 |
| पेरिस समझौता | 2015; 2°C से काफ़ी नीचे, लक्ष्य 1.5°C |
⏰ इस अध्याय को 2 दिन बाद दोहराएँ।
⚠️ सावधान: परीक्षक का जाल
जाल 1 — "समान नाम/वर्ष": मॉन्ट्रियल बनाम क्योटो। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) = ओज़ोन परत। क्योटो प्रोटोकॉल (1997) = हरितगृह गैसें। इसी तरह मिनामाटा (पारा) बनाम इटाई-इटाई (कैडमियम); नाइट्रोजन (हरितगृह गैस नहीं) बनाम नाइट्रस ऑक्साइड (हरितगृह गैस)।
जाल 2 — "लगभग सही कथन": "जैवभार का पिरामिड हमेशा सीधा होता है।" लगभग सही — स्थल पर सीधा होता है, पर समुद्र में उल्टा। हमेशा सीधा केवल ऊर्जा का पिरामिड है।
जाल 3 — "कालानुक्रमिक भ्रम": भोपाल त्रासदी 1984 → पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986। छात्र 1984 और 1986 को मिला देते हैं, या सोचते हैं कि वायु अधिनियम (1981) वन अधिनियम (1980) से पहले आया।
जाल 4 — "नकारात्मक वाक्यांश": "इनमें से कौन-सा स्वस्थाने तरीका नहीं है?" — उत्तर चिड़ियाघर/वनस्पति उद्यान/बीज बैंक होगा। "नहीं" को दो बार पढ़ें।
जाल 5 — "विपरीत कार्य-कारण": "वैश्विक तापन से ओज़ोन छिद्र बनता है।" ग़लत — ओज़ोन छिद्र मुख्यतः CFCs से बनता है और UV किरणों को अंदर आने देता है; वैश्विक तापन हरितगृह गैसों द्वारा ऊष्मा रोकने से होता है।
🔁 भाषाई कंट्रास्ट: हिंदी में ऐसा, अंग्रेज़ी में वैसा
पारितंत्र / पारिस्थितिक तंत्र — Ecosystem
पारिस्थितिकी — Ecology
उत्पादक / उपभोक्ता / अपघटक — Producer / Consumer / Decomposer
पोषी स्तर — Trophic level
खाद्य श्रृंखला / खाद्य जाल — Food chain / Food web
जैव आवर्धन — Biological magnification
सुपोषण — Eutrophication
जैव विविधता — Biodiversity
स्वस्थाने / बाह्य-स्थाने संरक्षण — In-situ / Ex-situ conservation
जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र — Biosphere reserve
आर्द्रभूमि — Wetland
समताप मंडल / क्षोभ मंडल — Stratosphere / Troposphere
हरितगृह प्रभाव — Greenhouse effect
अम्लीय वर्षा — Acid rain
जैव-निम्नीकरणीय — Biodegradable
गोडावण — Great Indian Bustard
🔗 स्थैतिक-गतिशील कड़ी (Static-Dynamic Link)
रामसर स्थल: PIB की 3 अगस्त 2026 की घोषणा के अनुसार ग्लॉ झील (Glaw Lake — अरुणाचल प्रदेश का पहला रामसर स्थल) भारत का 101वाँ रामसर स्थल बनी। (2014 में भारत में 26 रामसर स्थल थे।) यह संख्या बढ़ती रहती है — परीक्षा से पहले ताज़ा आँकड़ा देख लें।
बाघ अभयारण्य: मंत्रालय की वर्षांत समीक्षा (PIB, दिसंबर 2025) के अनुसार भारत में 58 बाघ अभयारण्य थे; 58वाँ, मध्य प्रदेश का माधव बाघ अभयारण्य, मार्च 2025 में अधिसूचित हुआ।
प्रोजेक्ट चीता: 17 सितंबर 2022 को नामीबिया से लाए गए चीते मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में छोड़े गए — भारत में चीते के विलुप्त घोषित होने (1952) के 70 वर्ष बाद।
जलवायु संकल्प: ग्लासगो के COP26 (1 नवंबर 2021) में भारत ने 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित किया।
वन क़ानून: 2023 में वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 का नाम बदलकर वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 किया गया।
📅 रिवीजन प्लानर: तीन-स्तरीय ब्लर्टिंग
| स्तर | कब | क्या करें |
|---|---|---|
| 🔴 तुरंत | 2 दिन बाद | खाली पन्ने पर पाँच पोषी स्तरों वाली एक खाद्य श्रृंखला बनाइए और 10,000 J से शुरू करके हर स्तर की ऊर्जा लिखिए। तीनों पिरामिड लिखिए और बताइए कौन-से उल्टे हो सकते हैं। |
| 🟡 साप्ताहिक | 7वाँ दिन | बिना देखे भारत के सभी पर्यावरण अधिनियम वर्ष सहित (72, 74, 80, 81, 86, 2002, 2006, 2010) और सभी अंतरराष्ट्रीय समझौते वर्ष सहित लिखिए। |
| 🟢 मासिक | 30वाँ दिन | बिना नोट्स एक प्रैक्टिस सेट हल कीजिए; हर ग़लत उत्तर का जाल-प्रकार लिखिए। 3 मिनट में सभी प्रदूषक–रोग जोड़े और सभी "हरित दिवस" लिख डालिए। |
🔢 हाई-यील्ड तथ्य एवं आँकड़े (एक नज़र में)
| तथ्य | आँकड़ा/विवरण |
|---|---|
| अगले पोषी स्तर तक पहुँचने वाली ऊर्जा | लगभग 10% |
| वायु में नाइट्रोजन / ऑक्सीजन | लगभग 78% / लगभग 21% |
| विश्व के स्थल क्षेत्र में भारत का हिस्सा | लगभग 2.4% (NCERT) |
| दर्ज प्रजाति-विविधता में भारत का हिस्सा | लगभग 8.1% (NCERT) |
| महाविविधता वाले देश | 17 (भारत उनमें से एक) |
| वन आवरण लक्ष्य (राष्ट्रीय वन नीति 1988) | क्षेत्र का एक-तिहाई (33%) |
| पेरिस समझौते का तापमान लक्ष्य | 2°C से काफ़ी नीचे, लक्ष्य 1.5°C |
| भारत के रामसर स्थल | 101 (3 अगस्त 2026 तक, PIB) |
| भारत के बाघ अभयारण्य | 58 (दिसंबर 2025 तक, PIB) |
| भारत में चीता विलुप्त घोषित | 1952 |
आप जो साँस लेते हैं, जो पानी पीते हैं, जो खाना खाते हैं — सब जीवन के इसी जाल से होकर आता है। इसे एक कहानी की तरह याद कीजिए — सूर्य से पौधा, पौधे से जंतु, जंतु से वापस मिट्टी — और इस अध्याय का हर प्रश्न उसी कहानी का एक सवाल बन जाएगा जिसे आप पहले से जानते हैं।